मंगलवार, अगस्त 24, 2010

कुछ सालों में पहली बार अनजान लग रहा है यह शहर,
हवाओं में सूनापन, कुछ रूखा-रूखा लग रहा है यह शहर,
गलियों में सन्नाटा सा छाया है, आज खामोश लग रहा है यह शहर,
सावर की बेला के बीच भी बंजर लग रहा है यह शहर,
लोग तो जाने-पहचाने है फिर भी न जाने आज क्यों अनजान लग रहा है यह शहर।

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