कुछ सालों में पहली बार अनजान लग रहा है यह शहर,
हवाओं में सूनापन, कुछ रूखा-रूखा लग रहा है यह शहर,
गलियों में सन्नाटा सा छाया है, आज खामोश लग रहा है यह शहर,
सावर की बेला के बीच भी बंजर लग रहा है यह शहर,
लोग तो जाने-पहचाने है फिर भी न जाने आज क्यों अनजान लग रहा है यह शहर।
मंगलवार, अगस्त 24, 2010
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