मंगलवार, अगस्त 24, 2010

कुछ सालों में पहली बार अनजान लग रहा है यह शहर,
हवाओं में सूनापन, कुछ रूखा-रूखा लग रहा है यह शहर,
गलियों में सन्नाटा सा छाया है, आज खामोश लग रहा है यह शहर,
सावर की बेला के बीच भी बंजर लग रहा है यह शहर,
लोग तो जाने-पहचाने है फिर भी न जाने आज क्यों अनजान लग रहा है यह शहर।
आईने की परछाई को सच मान बैठे,
उनके अहसान को मौहोबत मान बैठे,
लगाने चले थे ज़खमों पर महरम उनके,
और खुद ही मौहोबत में चोट खा बैठे।
कभी पलको में रहते थे जिनके हम,
वो हमसे आँख मिलाने से कतराते है,
वो कहते है हम बदल गए हैं,
इसलिए अब हर शाम किसी ओर की बाहों में बिताते हैं।

सोमवार, फ़रवरी 01, 2010

कहीं गुजरे ज़माने कि गूंज है,
कहीं रिस्ते पानी कि टीस है,
निकल चुकी है ज़िदगी यादों से आगे कहीं दूर,
पीछे रह गया तेरा टूटा हुआ मकबरा,
और उस पर कुछ सूखे हुए फूल।

शनिवार, दिसंबर 05, 2009

काफिरों की बस्ती में खङा मुसाफिर खुद से पूछ रहा है,

खुदा का पता में पूछु किससे,

यहाँ तो हर शक्स खुद को ढूँढ रहा है।

रविवार, नवंबर 29, 2009

मीडिया पर कटाक्ष

मज़हब के नाम पर रक्त रंजित है समां इतना,

कि तेरे कलम और अखबार दोनों भर जाए,

आँखे खोल कर देख ज़रा,

एक लाश तेरे ज़मीर की भी होगी।

गुरुवार, नवंबर 26, 2009

मेरी औकात मुझमें बसी मेरे हौसलों से है,
वक्त की आँधी से लङ जाऊँ, तू तो फिर भी इंसा है।