कुछ सालों में पहली बार अनजान लग रहा है यह शहर,
हवाओं में सूनापन, कुछ रूखा-रूखा लग रहा है यह शहर,
गलियों में सन्नाटा सा छाया है, आज खामोश लग रहा है यह शहर,
सावर की बेला के बीच भी बंजर लग रहा है यह शहर,
लोग तो जाने-पहचाने है फिर भी न जाने आज क्यों अनजान लग रहा है यह शहर।
मंगलवार, अगस्त 24, 2010
सोमवार, फ़रवरी 01, 2010
शनिवार, दिसंबर 05, 2009
रविवार, नवंबर 29, 2009
मीडिया पर कटाक्ष
मज़हब के नाम पर रक्त रंजित है समां इतना,
कि तेरे कलम और अखबार दोनों भर जाए,
आँखे खोल कर देख ज़रा,
एक लाश तेरे ज़मीर की भी होगी।
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