मंज़िले है उनकी और मैं चल रहा हूँ,
आँखें बंद कर हवाओं का रुख बदल रहा हूँ,
ले हाथों में थोङी सी माटी थोङा सा पानी,
मकान बुन रहा हूँ,
तारों की रोशनी में परछाईयाँ चुन रहा हूँ,
कब्रिस्तान में गुलिस्ता बुन रहा हूँ,
सासों को अपनी छोङ,
तेरी सासों संग चल रहा हूँ,
हाथों में तेरा हाथ थाम,
कोशिश कर रहा हूँ,
उम्मीद की रोशनी लिए चल रहा हूँ।
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
गुरुवार, नवंबर 12, 2009
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
