कहीं गुजरे ज़माने कि गूंज है,
कहीं रिस्ते पानी कि टीस है,
निकल चुकी है ज़िदगी यादों से आगे कहीं दूर,
पीछे रह गया तेरा टूटा हुआ मकबरा,
और उस पर कुछ सूखे हुए फूल।
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सोमवार, फ़रवरी 01, 2010
शनिवार, दिसंबर 05, 2009
रविवार, नवंबर 29, 2009
मीडिया पर कटाक्ष
मज़हब के नाम पर रक्त रंजित है समां इतना,
कि तेरे कलम और अखबार दोनों भर जाए,
आँखे खोल कर देख ज़रा,
एक लाश तेरे ज़मीर की भी होगी।
गुरुवार, नवंबर 26, 2009
गुरुवार, नवंबर 19, 2009
रविवार, नवंबर 08, 2009
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