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सोमवार, फ़रवरी 01, 2010

कहीं गुजरे ज़माने कि गूंज है,
कहीं रिस्ते पानी कि टीस है,
निकल चुकी है ज़िदगी यादों से आगे कहीं दूर,
पीछे रह गया तेरा टूटा हुआ मकबरा,
और उस पर कुछ सूखे हुए फूल।

शनिवार, दिसंबर 05, 2009

काफिरों की बस्ती में खङा मुसाफिर खुद से पूछ रहा है,

खुदा का पता में पूछु किससे,

यहाँ तो हर शक्स खुद को ढूँढ रहा है।

रविवार, नवंबर 29, 2009

मीडिया पर कटाक्ष

मज़हब के नाम पर रक्त रंजित है समां इतना,

कि तेरे कलम और अखबार दोनों भर जाए,

आँखे खोल कर देख ज़रा,

एक लाश तेरे ज़मीर की भी होगी।

गुरुवार, नवंबर 26, 2009

मेरी औकात मुझमें बसी मेरे हौसलों से है,
वक्त की आँधी से लङ जाऊँ, तू तो फिर भी इंसा है।

गुरुवार, नवंबर 19, 2009

हम भी है इस महफिल में,
आप अकेले तो नहीं,
माना के पहला जाम छलकाया है आपने,
मगर मदहोश होने का हक केवल आपका तो नहीं।
माना के बिन मांगे हर चीज़ मेरी आरज़ू से बङकर थी,
थी हवाओं में फैली खुशबू मगर,
टूटते किनारे की उदासी भी थी,
हर पल तू थी मेरी नज़रो में मगर,
मेरी तकदीर में मौत की खामोश दस्तक भी थी।
दिल के हर पहलू में दो आरज़ू होती है,
एक सपने में छिपी, एक हकीकत में बयां होती है,
कौन सी आरज़ू को छूलू में,
सब तुझसे शुरू, तुझपर खत्म होती है।

सोमवार, नवंबर 09, 2009

मुझे इत्तला है तेरे दर्द के वजूद की,
पर मरहम से दिल के नासूर भरा नहीं करते।

रविवार, नवंबर 08, 2009

शिद्दत से जिसे चाहा था,
वो अब मुद्दत से याद आते हैं,
किसे कहें अपना,
जब दोस्त ही भरी महफिल में तमाचा मार जाते हैं।
इश्क करने वालों को दुनिया अक्सर इसी नाम से जानती है,
कहती है - ' इस पागल को भी रोग लग गया है प्यार का ' ।
किसी पर इल्ज़ाम लगाने की औकात कहाँ हमारी,
हमें तो अपने आप से ही फुरसत नहीं मिलती।
इतना भी हमसे इत्तफाक नहीं अब के हमारे जनाज़े पर चले आते,
खुदा खैर बक्शे उनको जो कभी हमारे दिदार को तरस्ते थे।