गुरुवार, नवंबर 19, 2009

हम भी है इस महफिल में,
आप अकेले तो नहीं,
माना के पहला जाम छलकाया है आपने,
मगर मदहोश होने का हक केवल आपका तो नहीं।
माना के बिन मांगे हर चीज़ मेरी आरज़ू से बङकर थी,
थी हवाओं में फैली खुशबू मगर,
टूटते किनारे की उदासी भी थी,
हर पल तू थी मेरी नज़रो में मगर,
मेरी तकदीर में मौत की खामोश दस्तक भी थी।
दिल के हर पहलू में दो आरज़ू होती है,
एक सपने में छिपी, एक हकीकत में बयां होती है,
कौन सी आरज़ू को छूलू में,
सब तुझसे शुरू, तुझपर खत्म होती है।

गुरुवार, नवंबर 12, 2009

चल रहा हूँ

मंज़िले है उनकी और मैं चल रहा हूँ,

आँखें बंद कर हवाओं का रुख बदल रहा हूँ,

ले हाथों में थोङी सी माटी थोङा सा पानी,

मकान बुन रहा हूँ,

तारों की रोशनी में परछाईयाँ चुन रहा हूँ,

कब्रिस्तान में गुलिस्ता बुन रहा हूँ,

सासों को अपनी छोङ,

तेरी सासों संग चल रहा हूँ,

हाथों में तेरा हाथ थाम,

कोशिश कर रहा हूँ,

उम्मीद की रोशनी लिए चल रहा हूँ।



सोमवार, नवंबर 09, 2009

मुझे इत्तला है तेरे दर्द के वजूद की,
पर मरहम से दिल के नासूर भरा नहीं करते।

रविवार, नवंबर 08, 2009

शिद्दत से जिसे चाहा था,
वो अब मुद्दत से याद आते हैं,
किसे कहें अपना,
जब दोस्त ही भरी महफिल में तमाचा मार जाते हैं।
इश्क करने वालों को दुनिया अक्सर इसी नाम से जानती है,
कहती है - ' इस पागल को भी रोग लग गया है प्यार का ' ।